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नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=हिमांशु पाण्डेय }} <poem> '''(१)''' "बहुत दूर नहीं बहुत प...
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{{KKRachna
|रचनाकार=हिमांशु पाण्डेय
}}
<poem>

'''(१)'''
"बहुत दूर नहीं
बहुत पास "
कहकर
तुमने बहका दिया
मैं बहक गया ।

'''(२)'''
"एक,दो,तीन.....नहीं
शून्य मूल्य-सत्य है "
कहा
फिर अंक छीन लिए
मैं शून्य होकर विरम गया ।

'''(३)'''
तुम हो
जड़ों के भीतर, वृन्त पर नहीं
तुमने
ऐसा आभास दिया
मैंने जड़े खोद दीं ।

'''(४)'''
"विकल्प की कैसी आस
सत्य तो निर्विकल्प है "
मुझे समझाया था
मैं अब तलक
ढूंढ रहा हूँ सत्य ।

'''(५)'''
"चरैवेति, चरैवेति'
नारद ने कहा था, तुमने भी कहा
मैंने आस की डोर पकड़ ली
अभी तक मैं चल रहा हूँ
चलता ही जा रहा हूँ ।
</poem>
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