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03:31, 6 मार्च 2010 {{KKGlobal}}
{{KKRachna
|रचनाकार=शांति सुमन
|संग्रह = सूखती नहीं वह नदी / शांति सुमन
}}
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<poem>
शव किसी युवती का है
इसलिये भीड़ है देखने वालों की
उठानेवालों की नहीं
एक दूसरे का मामला बताकर
गाँव और रेलपुलिस का टालमटोल
कोई नई बात नहीं
जहाँ वह मिली है गटर में
वहाँ सैकड़ों किस्सों के सैंकड़ो मुँह
लिखी है जाने कितनी कहानियाँ
उसके सिरहाने पैताने
उसकी आत्मा में ईश्वर नहीं था
या उसकी आत्मा तक नहीं गया ईश्वर
वह सिर्फ़ देह थी, देह के साथ रही
देह लेकर मर गई
मनुष्य होने की आदिम परिभाषा
पर भी पत्थर रख गई ।
</poem>
५ जून, १९९३