अनंत प्रतीक्षा / मणिका दास

चारों तरफ़ मरघट का सन्नाटा
अबाध घूमता फिर रहा है अफ़वाह नामक एक दैत्य
आग लगेगी आग

युद्ध के पूर्वाभ्यास में अँधेरे में सैनिक
हरी पृथ्वी को ग्रस्त करना सीख रहे हैं
नए-नए कौशल
स्वप्न को दुःस्वप्न बनाने की तैयारी कर रहे हैं

धुए~म के शामियाने की तरफ़ उड़ना चाहता है कबूतर
नदियाँ ढूँढ़ रही हैं अपने प्राचीन रंग
फूल ढूँढ़ रहे हैं ख़ुशबू

मैं हूँ आशावादी क़लमकार
एक दिन थक जाएँगे जूझते-जूझते अँधेरे के सैनिक
नष्ट होगी स्वप्न को दुःस्वप्न बनाने की साज़िश
धुएँ के शामियाने की तरफ़ उड़ेगा कबूतर
नदियाँ ढूँढ़ लेंगी प्राचीन रंग
फूल ढूँढ़ लेंगे ख़ुशबू
मैं हूँ उसी की अनंत प्रतीक्षा में

मूल असमिया से अनुवाद : दिनकर कुमार

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