अपना मन तो बिल्कुल जोगी
जंगल और वीराना क्या ।
भीड़ नगर की नहीं खींचती
महलों का मिल जाना क्या।।
फुटपाथों पर नींद थी आई
गद्दों पर हम रातों जागे।
माया भागी पीछे पीछे
हम तो भागे आगे- आगे।।
अपना मन तो बिल्कुल जोगी
जंगल और वीराना क्या ।
भीड़ नगर की नहीं खींचती
महलों का मिल जाना क्या।।
फुटपाथों पर नींद थी आई
गद्दों पर हम रातों जागे।
माया भागी पीछे पीछे
हम तो भागे आगे- आगे।।