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आकांक्षा का तूफ़ान / शंख घोष

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इस गहन निस्पन्द निर्जनता में
अंधेरी साँझ की अजस्र निःसंग हवा में
तुम उठाओ --
बाल की तरह शीतल, चांद की तरह विवर्ण
अपना सफ़द ज़र्द चेहरा
विराट आकाश की ओर!
दूर देश में मैं काँप उठा हूँ आकांक्षा के असह्य आक्षेप से...
तुम्हारे चेहरे के सफ़ेद पत्थर को घेर काँप रहे हैं
आत्रनाद, प्रार्थना की अजस्र उंगलियों की तरह क्षीण
घुंघराले बाल
अंधेरी हवा में!
बादलों के आकाश में
कोई पुंज भारी हो उठा है
और उसके बीच
इच्छा की विद्युल्लता तेज़ी से झलक जाती है बारम्बार
प्रचण्ड वेग से फट पड़ना चाहती है
प्रेम की अशान्त लहर
बेचैन कर देता है अन्धकार का निस्सीम व्यवधान
मग्न स्थिर मिट्टी की सघन कान्ति।
तुम थामे रहो --
बादलों-सा शीतल, चांद-सा विवर्ण अपना चेहरा
रो-रोकर थक चुकी मिट्टी की लहर-जैसे स्तन
प्रार्थना में अवसन्न व्याकुल जीर्ण
दीर्घ प्रत्याशा का हाथ
उसी विक्षुब्ध विराट आकाश की आर --
और उसे घेरता हुआ अन्धकार... बिखरते केश
निस्सीम निःसंग हवा में अजस्र स्वरों के वाद्य!
क्रमशः प्रस्तुत यह सृष्टि
जैसे मधुरतम क्षणों में
वज्र बनकर टूट पड़ता है उसकी आकांक्षा का मेघ
तुम्हारी उद्धत उत्सुक विदीर्ण छाती के बीचों-बीच
मिलन की सम्पूर्ण कामना के साथ!
इसके बाद होगी
भीगी हुई अस्त-व्यस्त
इस भग्न पृथ्वी का कूड़ा-करकट बुहारती हुई
सुन्दर शीतल ममतामयी सुबह!!


मूल बंगला से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी