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कमाल की औरतें ४१ / शैलजा पाठक

चेहरे पर दिन
थका-थका सा रहता था
आंखों में रातों की
दहशत सहती थी
सब कुछ छिपा लिया
मुझसे बस इतना कह कर
आजकल काम बड़ा रहता है ƒघर में ।


तुम्हारी बनाई
इस खूबसूरत बावड़ी में
मेरी दिशाओं के सभी कोने
किनारों से टकरा कर
आहत हो रहे हैं
एक बार
मैं समंदर छूना चाहती हूं।


तुम कल भी आदमी थे
तुम आज भी आदमी ही हो
बदला तो सिर्फ इतना
कि अब मैं सिर्फ औरत नहीं ।


समय था
कि
मैं तुम्हारी जरूरत बन गई
अब यूं कि
अपनी जरूरत भर
पहचानते हो तुम।


तुम्हारे लिए
गिलास भर पानी लिए
खड़ी औरत की आंखें
गिलास से ’ज्यादा भरी थीं
तुम जरूरत भर देखते हो
और हक भर दिखाते हो।


हमेशा उस नाजुक
डोर से
वे रंगीन मछलियां
बंधने आतीं
पर बिंध जाती।


तुम्हारे देर से आने पर
मैं फ़िक्र जताती हूं
और मेरे देर से आने पर
तुम शक।