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कहाँ / महादेवी वर्मा

घोर घन की अवगुण्ठन ड़ाल
करुण सा क्या गाती है रात?
दूर छूटा वह परिचित कूल
कह रहा है यह झंझावात,

लिए जाते तरणी किस ओर
अरे मेरे नाविक नादान!

हो गया विस्मृत मानवलोक
हुए जाते हैं बेसुध प्राण,
किन्तु तेरा नीरव संगीत
निरन्तर करता है आह्वान;

यही क्या है अनन्त की राह
अरे मेरे नाविक नादान?