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गर्मियाँ शोखियाँ किस शान से हम / वाजिद अली शाह

 गर्मियाँ शोख़ियाँ किस शान से हम देखते हैं
 क्या ही नादानियाँ नादान से हम देखते हैं

 ग़ैर से बोसा-ज़नी और हमें दुश्नामें
 मुँह लिए अपना पशेमान से हम देखते हैं

 फ़स्ल-ए-गुल अब की जुनूँ-ख़ेज़ नहीं सद-अफ़सोस
 दूर हाथ अपना गिरेबान से हम देखते हैं

 आज किस शोख़ की गुलशन में हिना-बंदी है
 सर्व रक़्साँ हैं गुलिस्तान से हम देखते हैं

 'अख़्तर'-ए-ज़ार भी हो मुसहफ़-ए-रुख़ पर शैदा
 फ़ाल ये नेक है कुरआन से हम देखते हैं