दादा हरिद्वार से
लाए थे एक गोल पत्थर
उनके सारे जीवन की साध
एक पत्थर के आने से
पूरी हुई थी
पूजा की चौकी में
कई बार उसे उलट-पलट कर देखा
नदी किनारे का आम गोल पत्थर था
दादा को मैं चिढ़ाता रहता
‘पाहन पूजै हरि मिलै तो मैं पूजूँ पहाड़’
बड़े शाँत स्वर में
दादा कहते रहते
मेरे बाद तुम्हें इसकी ज़रूरत न हो
तो बेटा इसे नदी में बहा देना
पहाड़ पर धीरे-धीरे
उतरती है धूप
और पूजाघर के चौखट पर
दस्तक देती है
धूप में नहा कर गोल पत्थर
लगाता है सूरज-सा लाल तिलक
धीरे-धीरे गोल पत्थर में
निकल आई हैं जड़ें
शिराओं सी फैल गई हैं घर भर में
दादा और पिता के बाद
माँ रोज़ धूप में
नहलाती है गोल पत्थर को
दादा शायद जानते थे
कि जब गोल पत्थर में
सिमट आती हैं साधें
तो कितना मुश्किल होता है
पत्थर को नदी में बहाना।