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छंद 126 / शृंगारलतिकासौरभ / द्विज

मनहरन घनाक्षरी
(अभिसारिका-वर्णन)

साजि नव अंबर मनोज-मद-माँती बाल, साँझ ही समे तैं अभिसार की तयारी की।
‘द्विजदेव’ झींने-झींने बूँदनि सु ताही समैं, गरजि-बरसि घन सघन अँध्यारी की॥
मग ही मैं आइ ताहि मिलिगे गुबिंद तहाँ, देख तैं भुलाने छबि रूप-रसवारी की।
सूही सजी सारी की, जरी की, जरतारी की, सुआनन-उँज्यारी मैं चलनि चारु प्यारी की॥

भावार्थ: नायिका ने सोत्साहित होकर साँझ ही से अभिसार की तैयारी की, कामदेव के मद से मदमाती बाला के नवीन वस्त्र धारण करते ही मेघ भी गरज-गरज सघन अँधियारी (अँधेरा) कर मंद-मंद बूँदों से बरसने लगे। ऐसे समय रास्ते ही में प्राणप्रिय ‘नायक’ से भेंट हुई। देखते ही वह आनंद में ऐसा मग्न हुआ कि उसे (नायक को) देहाध्यास न रहा।