जिनको बजत हुकुम को बाजा / ईसुरी

जिनको बजत हुकुम को बाजा।
कान रीत में आजा।
हम खाँ जान देब द्द बैंचन।
भग रोकन नई साजा।
करो फिराद जावगे पकरे।
रोकें सें गम खाजा।
जानत नई बृजभान कुँअर खाँ,
जिसकी सकल समाजा,
चौरासी बृज कोस ईसुरी,
हियाँ राधका राजा।

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