जो वापिस नहीं लौटते / सुदर्शन वशिष्ठ

यह कविता उनके लिए जो वापिस नहीं लौटते
जिनके इंतज़ार में खड़ी हैं माएँ
दहलीज़ पर दरवाज़े से सटी हैं बहनें
कि लौटेंगे एक दिन घर
गए हैं जो परदेस।

कहा था बापू ने उनके जाने पर
इक दिन तो लौटना ही है
बाहर किस की कटी है
बाहर तो जाना है, मज़बूरी है।

फिर कहा था बापू ने
कम होता गया जब आना जाना
कि चाहे जितना रह लो बाहर
आखिर लौटना है।

वे नहीं लौटे
सच नहीं हुआ बापू का कहना
जो कभी हुआ करता था पत्थर की लकीर
लौटते भी थे आखिर
सालों बाहर रहकर सभी जन
नौकर चाकर
राजा के फौज के
जो कमाने जाते परदेस
बारह बरस बाद आकर सुनाते
अपने प्रवास के किस्से कहानियाँ
आँगन में खेल रहे पुत्रों से होता परिचय
फिर जाते,फिर लौट-लौट आते।
लौटते ही पखेरू अपनी ठाँव
एक बार तो अलख जगाता है जोगी
अपने गाँव
पंछी जहाज़ का बैठता है जहाज़ पर।

अब हुआ है झूठा बापू का वचन
अब नहीं लौटेंगे
जो चले गए हैं एक बार शहर बाज़ार
बसाते हैं वही अपनी दुनिया
सजाते हैं सपने
गाँव होता जाता है पराया।

करती है इंतज़ार माएँ
बूढ़े पिता,अनब्याही बहनें
बचपन के साथी
और ढहते हुए सपने
सुबह उठते ही माँगती हैं दुआएँ
चाहे कितने भी रहे सुखी सम्पन्न
देर रात तक देखें टी.वी.
जाएँ क्लब खेलें रम्मी
वे हैं तो बेगानों में
तभी शायद कहती हैं माएँ
लिखो एक कविता उन पर
कहतीं हैं अनब्याही बहनें
लिखो एक कविता उनपर
कहते हैं बूढ़े बाप
लिखो एक कविता उन पर
जो बसते हैं कल्पना की दुनिया में
जो वापिस नहीं लौटे।

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