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तहरा से दया के भीख माँगे / रवीन्द्रनाथ ठाकुर / सिपाही सिंह ‘श्रीमंत’

तहरा से दया के भीख माँगे
हमरा आवे भा मत आवे
तूं खुदे हमरा पर दया करके
अपना चरनन में खींच ‘ल’।
हम कबो कुछ खिलौना बना लीले
त तहरा के साफे भुला दीले
ओकरे फल फूल से निहाल होके
लागिले आराम से सुख के उपासना करे।
हमरा पर रंज होके हे प्रभु,
हमरे बनावल माटी के खेलाघर में
हमरा के छोड़ मत दीहऽ
दया क के, वज्र से मार-मर के,
हमरा के प्रेरित क के जगा दीहऽ
दुविधा का घेरा में सत्य कैद बा;
ओकरा के मुक्त क के उजागर करे वाला
तहरा के छोड़ के दोसर के बा?
मृत्यु के छेद द, अमृत झरे लागो।
हमरा दीनता के अगाध शून्य भर जाय।
पतन का व्यथा में चेतना बोल उठे।
विरोध आ कोलाहल में
तहार गंभीर वाणी गूँज उठो।