नमक / सुलोचना वर्मा

हो आई मैं तुम्हारे सपनों की चहारदीवारी से
और टाँग आई रूह की कमीज़
उस घर की दीवार पर लगे खूँटे में
कमरे में पसरे मौन ने बढ़ाई
तुम्हारे शब्दों से मेरी घनिष्ठता
जिस वक़्त तुम उकेर रहे थे
मेरा तैलचित्र अपने ख़्वाबों के आसमान पर
टपक पड़ी थी एक बूँद पसीने की
मेरे माथे से तुम्हारी ज़ुबान पर
सुनो, जब भर जाए तुम्हारे ख़्वाबों का कैनवास
उतार लेना मेरी रूह की कमीज़ खूँटे से
और ओढ़ा देना मेरी आकृति को
निभाते रहना वचन ताउम्र साथ देने का
कि तुमने खाया है नमक मेरी देह का ।

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