पंखुड़ियां गुलाब की हिलीं
मुस्कानें दस दिशा खिलीं।
दो कटोरे झील को भरे
खुशियों की लहर संग धरे
चन्द्रमा जब इनमें आ नहाये
रेत के वन दिख रहे हरे।
रश्मियां जब जल से आ मिलीं
मुस्कानें दस दिशा खिलीं
जोहती हैं बाट देहरियाँ
फुदक रही शाख गिलहरियां
एक हवा पात छू चली
कौंध उठी लाख बिजलियाँ।
कामनाएं खुद ही आ पिलीं
मुस्कानें दस दिशा खिली।।