माँ / सैयद शहरोज़ क़मर

उनकी पेशानी पर
स्याह धब्बे-सी फ़्लापी में है सुरक्षित
मौलाना दरगाह की कई मिन्नतें
एक से आँख समेत
मेरे चेहरे को पोंछती रहीं
टटोलती रहीं
दूसरा पल्लू सहेजे था
नियति के कवच से फूट पड़ी विडम्बना।

भाई व भाभीजान की नज़ाकत
पाख़ाने की टूटी चौखट का भी
मत करना ख़याल
मन लगाकर देना इम्तहान
जीत हमारी होगी
दिमाग़ीन भूलना नहीं
फल-दूध लेते रहना।'
अम्मी ने कहा था
जुगाई ऊर्जा बटुए से
जेब में उँडेलते।

मेथी के लड्डू की गर्मी
अब भी है
उसके सोन्धेपन के साथ
फ़िज़ा में बिखरी है
मासूम हिना<ref>भतीजी</ref> की
बुजुर्ग खाँसी
और बुजुर्ग अब्बी<ref>पिता</ref> की
मासूम सेहत।

अभी भी लटका है
खूँटी पर लटका है इमाम-ज़ामीन<ref>मुसलमान लोग जब यात्रा पर निकलते हैं तो सम्बन्धी यात्री के बदन पर एक पट्टी बाँध देते हैं, जिसमें पैसे रखे होते हैं। मंज़िल पर पहुँचने के बाद यह पैसा दान करना होता है। यह माना जाता है कि इससे यात्रा सुरक्षित रहती है।</ref>।

19.08.1997

शब्दार्थ
<references/>

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