मुक्तक-22 / रंजना वर्मा

सारी' दुनिया को हिला कर दोस्तों
मौत से आंखें मिला कर दोस्तों।
देश सेवा में समर्पित जिंदगी
नित करो दिल को खिलाकर दोस्तों।।

जिस बात से अभी तक इनकार कर रहे
अब सामने उसी का इज़हार कर रहे।
लब पर लगा मचलने बस नाम उसी का
ताजिंदगी जिसे थे वो प्यार कर रहे।।

सत्पुरुषों का संग, सदा सुख देने वाला
होता यह निस्संग, जगत में बड़ा निराला।
जब उगता है भाग्य, तभी यह मिलता भाई
दिखलाता सत्पंथ, लक्ष्य जीवन का आला।।

वैरी सदृश कुसंग, निकट जब आता भाई
नहीं कहीं सत्पंथ, किसी को पड़े दिखाई।
करता नित्य विनष्ट, सभी के सद्गुण सारे
रहिये इससे दूर, मिले यद्यपि कठिनाई।।

खुशबुओं के हसीन पंखों ने एक नन्ही कली खिला दी है
गुनगुनाता हुए भ्रमर देखो घूम कर कर रहा मुनादी है।
तितलियों का हुजूम भी आया देखने को नयी दुल्हन जैसे
भोर की रश्मि ने भी तो आ कर कई रंगोलियाँ सजा दी है।।

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