रुठलोॅ रुठलोॅ सब्भे जल छै / अमरेन्द्र

रुठलोॅ रुठलोॅ सब्भे जल छै
उम्मीदोॅ में तहियो नल छै
नींद अगर जों आबी जाय तेॅ
टाट केरोॅ टुकड़ो मखमल छै
नै आय तेॅ कल केॅ ही भीजतै
ई तेॅ औरत रोॅ आँचल छै
छाती ठोकी कोय कहौ तेॅ
हमरोॅ जीवन गंगाजल छै
गौर करोॅ तेॅ हर मानुख ही
थोड़े-थोड़ोॅ पर घायल छै
केना नाँचै मन रोॅ हिरना
सुख रोॅ राधे जों ओझल छै
निर्वासित रं ‘आज’ छै हमरोॅ
‘अग्नि परीक्षा’ जहनोॅ ‘कल’ छै

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