Last modified on 16 जुलाई 2013, at 18:46

वसंत / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

चावमय लोचन का है चोर
नवल पल्लवमय तरु अभिराम;
प्रलोभन का है लोलुप भाव,
ललित लतिका का रूप ललाम।
मनोहरता होती है मत्त
मंजरी-मंजुलता अवलोक;
हृदय होता है परम प्रफुल्ल
कुसुम-कुल-उत्फुल्लता विलोक।
कान में पड़ती है रस-धार
सुने कोकिल का कल आलाप;
रसिकता बनी सरसता-धाम
देखि अलि-कुल का कार्य-कलाप।
सुरभिमय बनता है सब लोक
हुए मलयानिल का संचार;
भूरि छवि पा जाती है भूमि
पहन सज्जित सुमनों का हार।
गगन-तल होता है सुप्रसन्न
लाभ कर विमल मयंक-विकास;
विहँसती सित-वसना, सित-गात
सिता आती है भूतल-पास।
भव मधुर नव-जीवन-आधार,
लोक-कमनीय विभूति-निवास;
है प्रकृति-नवल-वधू-श्रृंगार
सुविलसित सरस वसंत-विलास।