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वापसी / गौरव पाण्डेय

माँ.!
उतारो मेरी बलायें
चाचियों को सूचना दो
बनाओ आज रात मीठे पकवान

बहन.!
आओ मेरी छाती से लग जाओ
अपने आँसुओं से मुझे जुड़ाओ

भौजाईयों!
कनखियों से न निहारो मुझे
तुम्हारा दुलारा आँचर-छोर ही हूँ

भाई.!
संभालो मेरी भुजाएँ
तुम्हारी जरूरत है मुझे

पिता.!
मुझे माँफ कर दो
अभी झुकूँगा तो गिर पड़ूँगा

घर.! नीँम.! तुलसी.!
मुझे छाँव दो
सहेज के रखी थी जो
इसी दिन के लिए

यारोँ!
गली-गली जुलूस निकालो मिलन के
कि मैं ठीक ठाक लौट आया हूँ
नहीं हुआ किसी हादशे का शिकार
किसी गलत रास्ते नहीं गया मैं
मैने नहीं छीनी किसी की रोटी
और भूखा भी नहीं मरा

ओ माँ!
पुनर्जन्म हो रहा मेरा
नाऊँन चाची को बुलवाओ
पड़ोस से दूध मंगवाओ
सोहर गवाओ
उत्सव मनाओ
कि ठीक-ठाक लौटा हूँ मैं
और मुझे याद हैं
घर- खेत -परिवार- पड़ोसी
मुझे याद हैं सारे रिश्ते अभी भी!