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{{KKRachna
|रचनाकार=एहतराम इस्लाम
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<poem>

अपने सीनों में मेरा बिम्ब बराबर देखो
दोस्तों ! मुझको अगर आईना बनकर देखो

यह पहाड़ों के पिघलने का नतीजा तो नहीं
पानी पानी हुआ जाता है समन्दर देखो

कैसे लुट जाता है विश्वास के हाथों कोई
अपने हाथों से मुझको जहर पीला कर देखो

है तो पत्थर ही उसके चरण के नीचे
भाग्य ही भाग्य मुकद्दर ही मुकद्दर देखो

डूबते जाओ मगर थाह नहीं मिल पाती है
कितना गहरा है यह अहसास का सागर देखो

मेरा दावा की उड़ा लाऊंगा नींदें उसकी
उसका चैलेन्ज कभी स्वप्न में आ कर देखो
</poem>