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गीत-फ़रोश / भवानीप्रसाद मिश्र
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06:41, 9 जुलाई 2013
जी हाँ, हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूँ।
जी गीत जनम का लिखूँ,
मरन
मरण
का लिखूँ; जी, गीत जीत का लिखूँ,
शरन
शरण
का लिखूँ;
यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
यह गीत पित्त का है, यह बादी का।
Sharda suman
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