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{{KKRachna
|रचनाकार=संतलाल करुण
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|संग्रह=अतलस्पर्श / संतलाल करुण
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<poem>माँ, बहन, बेटी के आँसू पे यहाँ रोता है दिल
रोज़ लुटती अस्मतें, क़त्लों का ग़म ढोता है दिल |

आबरू को उम्रदारों ने भी बदसूरत किया
मर्दों का बचपन भी है बदकार बद होता है दिल |

शाहो-साहब औ’ गँवारों सब में बद शह्वानीयत
सब की आँखों में चढ़ा शर्मो-हया खोता है दिल |

है हुक़ूमत बेअसर बेख़ौफ़ हैं ज़ुल्मो-ज़बर
हर घड़ी हर साँस जैसे ख़ार पे सोता है दिल |

आज भी शै की तरह हैं घर या बाहर औरतें
बेरहम इंसाफ़ भी तेज़ाब से धोता है दिल |
</poem>
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