Changes

नानी का संदूक / श्रीनाथ सिंह

735 bytes removed, 10:57, 21 अगस्त 2015
{{KKCatBaalKavita}}
<poem>
नानी का सन्दूक संदूक निराला , हुआ धुएं धुएँ से बेहद काला। पीछे से वह खुल जाता है , आगे लटका रहता ताला।ताला! चन्दन चंदन चौकी देखी उसमें , बेसन सूखी लौकी देखी उसमें। उसमें,बाली जौ की देखी उसमें , खाली जगहों में है तालाजाला, नानी का सन्दूक निराला। संदूक निराला!  शीशी में गंगा जल की उसमें, चींटी ताम्रपत्र, तुलसीदल उसमें,चींटा, झींगुर , खटमल उसमें। ताम्र पत्र तुलसी दल उसमें , जगन्नाथ का भात उबाला।उबाला, नानी का सन्दूक निराला।संदूक निराला!  मिलता उसमें कागज कोरा , मिलती मिलता उसमें सूई सुई डोरा।डोरा, मिलता उसमें सीप -कटोरा, मिलती उसमें कौड़ी माला।माला, नानी का सन्दूक संदूक निराला ! जब लड़कों को खाँसी आती , आती उसमें निकल दवाई। कभी ढूँढने से मिल जाता ''-साभार: नंदन, पेड़ा अगस्त 1993, बर्फी ,गट्टा लाई। जो कुछ खाकर मरना चाहे , ढूंढे उसमें जहर धतूरा। डर है चोर न उसे चुरा लें , समझो उसे म्यूजियम पूरा।उसको छोड़ न लेगी नानी ,दिल्ली का सिंहासन आला। नानी का सन्दूक निराला।32''
</poem>