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मिनख अर भगवान : तीन / दुष्यन्त जोशी
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<poem>
आखौ जग देख
भीतर री आंख सूं
भगवान परगट सी
पग-पग माथै।
भगवौं बानौ
पळेट'र
काईं ढूंढै मिनख।
</poem>
आशिष पुरोहित
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