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01:38, 24 मार्च 2019 {{KKRachna
|रचनाकार=भारतेन्दु मिश्र
|अनुवादक=
|संग्रह=बोली बानी / जगदीश पीयूष
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<poem>
जिउ हमार जुड़ुवाये हैं
ह्यांवत के दिन आये हैं
लत्ता तन के फाटि रहे
कइसेव दिन हम काटि रहे
तपता बिनु चिनगिउ बुझिगै
क्वइरा के दिन आये हैं
राम-जोहरार न कइ पायेन
मतलब सिद्ध न कइ पायेन
थूकू निगिल लेइति है अब
चुप्पी के दिन आये हैं
भूलि गये मोलहे दादा
भूलि गये रामू काका
करजौ कोऊ देति नहीं
अइसन दुरदिन आये हैं
<poem>