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11:39, 17 अप्रैल 2022 {{KKGlobal}}
{{KKRachna
|रचनाकार=मरीने पित्रोस्यान
|अनुवादक=उदयन वाजपेयी
|संग्रह=
}}
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<poem>
दिन भागते हुए बीत गए, भागते हुए बीत गए
और अब यह शहर तुम्हारे सामने पेश है
यह शहर जिसकी ढेरों गलियाँ
तुम्हें सब देती हैं
वह सब जो तुम जाने कब से
खोजते रहे थे और आख़िरकार पा गए थे
लेकिन उन्हें खोजने की प्रक्रिया में
तुमने अपनी दूसरी प्रिय ढेरों चीजे़ं खो दीं
और अब यह समझना मुश्किल है कि
अपने सामने पेश इस ऐश्वर्यशाली शहर को पाकर
जहाँ की सैकड़ों गलियाँ
तुम्हें सब दे रही हैं
वह सब दे रही हैं, जो तुम
जाने कब से खोजते रहे थे और
आख़िरकार पा गए थे,
तुम ख़ुशी से रो रहे हो ?
या खोजने और पाने की
लम्बी प्रक्रिया में
अपनी प्रिय चीज़ों के खो जाने के
दुःख से रो रहे हो ?
'''अँग्रेज़ी से अनुवाद : उदयन वाजपेयी'''
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