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पछै / चंद्रप्रकाश देवल

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|संग्रह=उडीक पुरांण / चंद्रप्रकाश देवल
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<poem>
घलायोड़ी अदीठ कार सूं रिस परी
थूं रळकती-बैवती
पूगण नै वहीर च्है
अर अधबिचाळै किणी बंधा में
अमूंझती रोड़ीज जावै

म्हैं बगनौ व्हियौड़ौ
पगां ऊभौ समंदर
बाकौ फाड़्यां घड़ी-घड़ी
छौळां रै मिस डोकतौ
जाझी उडीक कर ई लूं... पछै।

सिरजण अर संघार री
विधोविध अणमाप उपजती तकनीकां बिचाळै
लगौलग पांगरतौ
औ जिकौ बावळौ बीह है
जिण बाबत
अपांरै समिया रै आथियां पूछै
ठाह पड़ै
के वौ प्रीत सूं बण्यौ हौ
थारै छतां औ पतवांण ई लूं... पछै।

जूंण अर मौत री
तारां छाई घाटी बिचाळै
अवंळ-भंवळ पगडांडी रै मुकाम
थूं कठै चालै है दीसै कोयनीं
इण बीच
जे म्हैं खुद रा खोज काढ ई लूं... पछै।

सपना री अेक इज मसोड़ में सूता है
विणास अर विकास
अर सोड़ मांयलौ सिणफिण अंधारौ
नीं धा-काळौ है नीं उजास-वरणौ
इण बिचाळै थूं नीं अदीठ है नीं सांम्ही
दोनूं पट मिल्योड़ा
इण बगत री सेरी मांयकर
अेक गळी काढ ई लूं... पछै।

अछांना जुद्ध अर चावी कर्योड़ी सांयत बिचाळै
कारगिल री टूंक माथै
वाभराभूत रबड़तोड़ी थूं
अर धणियाप री दड़ी सूं
मारदड़ी रमता जग बिचाळैकर
थनै मुगती रै नांवै हेलौ पाड़ ई लूं... पछै।

जे जिजीविखा अर मुमूरखा बिचाळै
दूजौ कीं नीं व्हैय
फगत अेक उडीक इज व्ही... पछै।
</poem>
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