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|रचनाकार=अरुणिमा अरुण कमल
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<poem>
कंप्यूटर पर डले आंकड़े
नहीं जोड़ना, घटाना ही पड़े,
न काग़ज़, न पेन की ज़रूरत
पत्र टाइप करो लंबे-लंबे,
एक बनाओे, दस को भेजो
वर्तनी व भाषा भी चेक करे।

बस लगे न वायरस इनको कभी,
हर क़दम आसानी होती जिंदगी!

चली मेट्रो, दिल्ली में अपने
न रेड लाइट, न जाम ही लगे
नहीं धूल, न पसीने की बदबू
प्रदूषण का नहीं कोई इशू,
नहीं रही सीढ़ी की खोज
एस्केलेटर का मज़ा लें रोज

भौंचक्क रही मैं देखती एकबारगी,
हर क़दम आसान होती जिंदगी!

नहीं ज़रूरी टाइम है देना
रेडी टू ईट खरीद है लेना,
किचन के हर झंझट से छुट्टी
ग्राइंडर की अब लगे न ड्यूटी,
लहसुन, प्याज का पेस्ट तैयार
कटी सब्जियों के पैक हजार,

वर्किंग बहू से ना रही नाराजगी,
हर क़दम आसान होती जिंदगी!
</poem>
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