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{{KKRachna
|रचनाकार=ओमप्रकाश सारस्वत
|संग्रह=दिन गुलाब होने दो / ओमप्रकाश् सारस्वत
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<Poem>
सुख, शिरीषसुमनों-सा,
अल्पजीवी यौवन है,
दुख, देवतरुओं के
जंगल-सा नवल नया
सम्बंधी, खैरों-से बंजर के मेले हैं,
सेमल के सुमनों-से, व्यर्थ पर रुपहले हैं,
शहतूती मीठापन
सबका-सब रीत गया
चीड़वन में वायु, यों सांय-सांय करती है,
आदिमनु की इच्छा ज्यों, अतिम दम भरती है,
कीकर का केवल हठ,
मधुऋतु से जीत गया
आम्रफल के रस-जैसा उत्साह झरता है,
पीपल के पत्तों-सा, उड़-उड़ मन मरता है,
हमको तो सारी उम्र
मौसम विपरीत गया
चोरों की बस्ती में, केसर के फूलों की,
नर्सरी जो रोपी तो, उग भाई भूलों-सी,
चन्दन सरसाने का
मंगल युग बीत गया
</poem>
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