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{{KKRachna
|रचनाकार=श्रीनिवास श्रीकांत
|संग्रह=घर एक यात्रा है / श्रीनिवास श्रीकांत
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<Poem>
गांव कहां रहे
अब ग्राममय

उनके घर और रास्ते
हो गये हैं अदल-बदल
जिन्दगियां फांक-फांक

अब
न उपलों की गन्ध है
न कच्चे चूल्हों से
उठता धुंआ

शामलात मटकन्धों पर
जहां देर रात तक
चलती थीं
बुजुर्गों की ठहाकेदार
चिलमों से लटियाती महफिलें
वहां अब कुछ मनचले
मटकते हैं
पॉपगानों पर
खनखनाती हैं बोतलें

गाँव में कुछ बचा है
तो बचा है
एक अदद
बूढ़ा बरगद
देता है गर्मियों में
अब भी छाँव
झोंकों से फड़फड़ाते हैं
उसके पत्ते
जिन्हें अब कोई नहीं सुनता

अब हवा को
थप्पड़ मारती हैं
पास की सड़क से
भड़भड़ा कर गुजरती
गाड़ियाँ

समय ने चीर दिया बीच से
ढलवां जमीन को
और बना दी एक सड़क
देखते रह गए
झूमती टहनियों के गुच्छे
और घास के
नन्हें-नन्हें फूल

चरागाहों की ढलानों पर
अब नहीं रही
वह चहलपहल
खेलते थे जहाँ
गाँव के ग्वाल
घर-घर
रपटते यहाँ-वहाँ
बिखरी भूरी
चीड़ की पत्तियों पर
बनाकर रामबाण की
विमाननुमा गाड़ियाँ
पंछी की तरह उड़ते
अपने अपने आसमानों के साथ

कटता रहा समय
और समय के साथ-साथ
कटते गये एक दूसरे से
गाँव के लोग

कोई बने चपरासी
कोई बाबू
कोई कुर्सी घुमाते अफसर
भूल गए सब
एक दूसरे के
चेहरे भी

खुरों की पटक से
नहीं उड़ती अब
घर लौटते पशुओं की
गोधूलि

एक पूरा मंजर ही लील गयी हैं
बढ़ते हुए दैत्याकार शहर की
गाँव की ओर सरकती
इमारतें
ओर इनके साथ ही धँस गया है
एक जीता-जागता इतिहास
यादें भी हो गयी हैं जमींदोज।
</poem>
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