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दु:ख / चंद्र रेखा ढडवाल
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16:26, 6 मार्च 2010
<poem>
इतने लोगों के बीच
तुम्हें घर आने को
दु:ख / मात्र
नहीं
कह पाने
सहते रहने
का दु:ख
/ विकल्प के
सीमित
नहीं
है
तुम्हारे नहीं आने तक ही
होने का भी.
</poem>
द्विजेन्द्र द्विज
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