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हाइकु / कमलेश भट्ट 'कमल'
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13:41, 9 जून 2010
प्यासा सूरज।
निकली नहीं कन्जूस बादलों से एक भी बूँद
।
तरस गये पहचान को खुद सावन-भादौ में।
डा० जगदीश व्योम
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