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षड़यन्त्र / महेश चंद्र पुनेठा

तुम बुनती हो
एक स्वेटर
किसी को ठण्ड से बचाने को
और
मैं रचता हूँ
एक कविता
ठण्ड को ख़त्म करने को ।

गर्म रखना चाहती हो तुम
और
गर्म करना चाहता हूँ मैं भी ।

कमतर ठहराता है जो
तुम्हारे काम को
ज़रूर कोई षड्यन्त्र करता है ।