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साँप और आदमी / माया मृग

भीतर जागा साँप!
फुत्कारा- ज़हर उगला,
भीतर सब ‘नीला’ हो गया!
आँखों पर, पलकों में
कालिख उतर आई,
ज़ुबान पर पहले से कहीं ज़्यादा
मिठास आ गई!
भीतर फैलता ज़हर
मीठा लगने लगा,
आदमी शनैः शनैः मरने
लगा,
साँप शनैः शनैः बढने लगा!