स्मृतियाँ- 8 / विजया सती

क्या कोई आता है - फैलाकर हाथ
समेटने को किसी का बिखराव?
क्या कोई खोलता है - मन के उन्मुक्त द्वार
सुलझाने को किसी की उलझन?
क्या कोई पहुँचता है वहाँ - जहां हम अकेले होते हैं और उदास?
या हमें खुद ही आना पड़ता है- उदासी के घेरे के पार ?
और खुद ही ढोना होता है?
पने दर्द का अम्बार

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