Last modified on 1 मई 2011, at 15:46

पैसा / कहें केदार खरी खरी / केदारनाथ अग्रवाल

Dkspoet (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:46, 1 मई 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=केदारनाथ अग्रवाल |संग्रह=कहें केदार खरी खरी / के…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

पैसा
दिमाग में वैसे
सुअर
जैसे हरे खेत में

बाप
अब बाप नहीं
पैसा
अब बाप है

पैसे
की सुबह
और
पैसे
की शाम है

दुपहर की भाग-दौड़ पैसा है
पैसे के साथ पड़ी रात है

रचनाकाल: ३०-०१-१९६९