कोई औचक झंझोड़ जाता है
साज़ के तार तोड़ जाता है
वो पासबान तो नहीं होगा
जो सर-ए-राह छोड़ जाता है
काफ़िया किसको याद रहता है, जब
कोई संगीन मोड़ आता है
(रचनाकाल : 2003)
कोई औचक झंझोड़ जाता है
साज़ के तार तोड़ जाता है
वो पासबान तो नहीं होगा
जो सर-ए-राह छोड़ जाता है
काफ़िया किसको याद रहता है, जब
कोई संगीन मोड़ आता है
(रचनाकाल : 2003)