Last modified on 11 सितम्बर 2007, at 00:04

बोझ / मधु शर्मा

अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 00:04, 11 सितम्बर 2007 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मधु शर्मा |संग्रह=जहाँ रात गिरती है }} इसे किसे दूँ सबक...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)


इसे किसे दूँ

सबके हिस्से का भी

अगर यह मेरे सिर है


कहाँ रखूँ इसे

इस अनुनय के साथ

कि ठेस न लगे

इसकी गरिमा को

और जीवन की तरह

हल्का और अखण्ड लगे


जैसे मृत्यु ।