(किनारे की नियति)
तोड़ कर पत्थर नदी निकली
बहे झरने
सोचते हैं पेड़ तट के
हमें क्या करने!
जब उठेंगे जल सतह पर
लहर के परचम,
खड़े रहकर धार के-
तेवर छुएँगे हम,
पीठ पर रख पाँव
आए दिन घड़े भरने!
फिर उफनती खिलखिलाती
हँसी गूँजेगी,
घाव सोयी बस्तियों के
नदी छू लेगी,
बीच से बचकर लगेंगी-
घाट से नावें गुज़रने।
जड़ों की मिट्टी बहेगी
हम झुकेंगे और
कौन रोकेगा किनारों की-
नियति का दौर
उठेगा चुपचाप कोई
फिर जगह भरने।