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बातें हर दौर की / गुलाब सिंह

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आम हुए श्रीमान
कलँगी चमकी बौर की।

हर अँखुआ
हँसने को
बेबस बेचैन हुआ,
सोच रहा आदमी
मौसम क्यों-
मैं न हुआ?

कब आएगी अपनी
यह तो बारी और की।

धन खेतों में
न हँसे
पान के बरेजों में,
जेबों में जिए
कभी
गलतियों गुरेजों में,

फागों बिन होली
बिन रागों गनगौर की।

नदियों के नाम
मिले
रेत के उलाहने,
पानी के अर्थ खुले
बूँदों के सामने,

ऋतुएँ तो ले आतीं
बातें हर दौर की।