Last modified on 28 फ़रवरी 2008, at 08:58

प्रात-चित्र / केदारनाथ अग्रवाल

Pratishtha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 08:58, 28 फ़रवरी 2008 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

रवि-मोर सुनहरा निकला,

पर खोल सबेरा नाचा,

भू-भार कनक-गिरी पिघला,

भूगोल मही का बदला ।
नवजात उजेला दौड़ा,

कन-कन बन गया रूपहला ।

मधुगीत पवन ने गाया,

संगीत हुई यह धरती,

हर फूल जगा मुस्काया !