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लाखों में एक / शंभूप्रसाद श्रीवास्तव

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आसमान में लाखों तारे
लेकिन उनको कौन निहारे,
उगकर सारी रात चमकते
मगर अँधेरा मिटा न सकते।

एक अकेला चंदा आकर
अपनी किरणों को फैलाकर,
सबकी आँखें शीतल करता
सबके मन में अमृत भरता।

यह दुनिया भी बहुत बड़ी है
इनसानों से भरी पड़ी है,
हर कोई है नन्हा तारा
बनकर चाँद करो उजियारा।

-साभार: पराग, बंबई