Last modified on 18 अप्रैल 2017, at 09:45

सफर में ऐसे भी मंजर आए / अमरेन्द्र

Rahul Shivay (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 09:45, 18 अप्रैल 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अमरेन्द्र |अनुवादक= |संग्रह=द्वार...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

सफर में ऐसे भी मंजर आए
दूर तक लोग थे न घर आए

मुझको लगता है मंै ही जाता हूँ
तन्हा-सा जब कोई नजर आए

जिन्दगी हो जहाँ, बुला लाओ
मेरी तो मौत की खबर आए

हम मना जिसके लिए करते रहे
क्या किया तुमने वो ही कर आए

उनको चेहरा कहाँ दिखाई दे
जिनकी आँखों में बस कमर आए

ऐसी क्या दुश्मनी थी मंजिल से
किसलिए राह में बिखर आए

तुम्हें तो जिन्दगी से नफरत थी
आज अमरेन्द्र तू किधर आए ।