रात अँधेरी,
भूख और जालिम बंबा का पानी।
इत मूँदे, उत फूटे
किरिया-भरा न दीखे
फरुआ चले न खड़ी फसल में
खीझे-झींके
पहली सींच
ठंड में भीगा
अकड़ गया रमजानी।
लालटेन अलसेट दे गई
शीशा टूटा
उड़ी शायरी
‘पत्ता पत्ता-बूटा बूटा’
हाल न उसका
कोई जाने
कैसी अकथ कहानी।
मिट्टी में लिथड़े
पाजामा-पहुँचे धोए
कोट न फतुही थर-थर काँपे
खोए-खोए
रोक मुहारा
आस्तीन से
पोंछ रहा पेशानी।
बगीचिया से बीन जलावन
आग जलाई
देह सिंकी, बीड़ी
सुलगी
कुछ गरमी आई
बदली सूरत का
सच जाना
बढ़ी और हैरानी।