Last modified on 27 अगस्त 2017, at 14:15

बुतों के दिल जुबाँ / अर्चना कुमारी

Anupama Pathak (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:15, 27 अगस्त 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अर्चना कुमारी |अनुवादक= |संग्रह=प...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

गिरवी रखे हुए घर
और बिकती ज़मीनों पर
एक बुत रखा गया है
खानाबदोश हो चुके लोग
प्रेम में हैं शायद

प्रतिदान में स्वीकृति की प्रत्याशा लिए
एकटक देखती हैं कई जोड़ी आंखें
उठी गर्दन झुकते ही
सहज हो जाती हैं पलकें

सदियों से बुतों के पास
केवल मन था
सपने थे
कंठ में स्वर नहीं था
और तेवर में बगावत नहीं थी
बुतों के हिस्से में आए
झुके लोगों के लिए
बुत बने रहना
बुतों का सजदा है

बुतों के सीने में दिल होता है
जबाँ नहीं होती !