साँकल / नीलेश रघुवंशी

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कितने दिन हुए
किसी रैली जुलूस में शामिल हुए बिना
दिन कितने हुए
किसी ज़ुल्म जोर ज़बरदस्ती के खिलाफ़
नहीं लगाया कोई नारा
हुए दिन कितने नहीं बैठी धरने पर
किसी सत्याग्रह, पदयात्रा में नहीं चली जाने कितने दिनों से
‘कैण्डल लाईट मार्च’ में तो शामिल नहीं हुई आज तक
तो क्या
सब कुछ ठीक हो गया है अब?

इन दिनों क्या करना चाहिए
ऐसी ही आवाज़ों के बारे में बढ़-चढ़कर लिखना चाहिए
‘चुप’ लगाकर घर में बैठे रहना चाहिए
या इतनी जोर से हुंकार भरना चाहिए कि
निर्लज्जता से डकार रहे हैं जो दूसरों के हिस्से
उठ सके उनके पेट में मरोड़
यह और बात है कि
सड़कें इतनी छोटी और दुकानें इतनी फैल गई हैं कि
जुलूस भी तब्दील हो जाते हैं भीड़ में।


विरोध के बिना जीवन कैसा होगा
घर के दरवाजे पर साँकल होगी
लेकिन उसमें खटखटाहट ना होगी
साँकल खटखटाए बिना दरवाज़े के पार जाएँगे
तो चोर समझ लिए जाएँगे
चान्द आधा निकला होगा और कहा जाएगा हमसे
कहो — पूरा निकला है चान्द।

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