Last modified on 23 जून 2008, at 07:53

इन सर्दियोँ में / मंगलेश डबराल

Pratishtha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 07:53, 23 जून 2008 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मंगलेश डबराल }} पिछली सर्दियाँ बहुत कठिन थीं<br> उन्हें ...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

पिछली सर्दियाँ बहुत कठिन थीं
उन्हें याद करने पर मैं सिहरता हूँ इन सर्दियों में भी
हालांकि इस बार दिन उतने कठोर नहीं

पिछली सर्दियोँ में चली गयी थी मेरी माँ
खो गया था मुझसे एक प्रेमपत्र छूट गई थी एक नौकरी
रातों को पता नहीं कहाँ भटकता रहा
कहाँ कहाँ करता रहा टेलीफोन
पिछली सर्दियोँ में
मेरी ही चीज़ें गिरती रही थीं मुझ पर

इन सर्दियोँ में
निकालता हूँ पिछली सर्दियोँ के कपड़े
कम्बल टोपी मोज़े मफ़लर
देखता हूँ उन्हें गौर से
सोचता हुआ बीत गया है पिछला समय
ये सर्दियाँ क्यों होगी मेरे लिए पहले जैसी कठोर