भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

जैसे जैसे हम बड़े होते गए / विजय वाते

Kavita Kosh से
Pratishtha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 04:56, 29 जून 2008 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=विजय वाते |संग्रह= दो मिसरे / विजय वाते }} जैसे-जैसे हम बड...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जैसे-जैसे हम बड़े होते गए|
झूठ कहने में खरे होते गए|

चांदबाबा, गिल्ली डंडा, इमलियाँ,
सब किताबों के सफे होते गए|

अब तलक तो दूसरा कोई न था,
दिन-बी-दिन सब तीसरे होते गए|

एक बित्ता कद हमारा क्या बढ़ा,
हम अकारण ही बुरे होते गए|

जंगलों में बांगाबा कोई न था,
यूँ ही बस, पौधे हरे होते गए|