भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
राधा बिन कान्हा / अरुण हरलीवाल
Kavita Kosh से
Rahul Shivay (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:30, 2 अगस्त 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अरुण हरलीवाल |अनुवादक= |संग्रह=कह...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
राधा बिना कान्हा हइ आधा, सखी रे!
राधा बिना कान्हा हइ आधा।
वइसे तो किसना के सारा जग प्यारा;
राधा मगर सब्भेला जादा, सखी रे!
राधा बिना कान्हा हइ आधा।
राधा के नेह बनल संबल किसन के;
चीर देलक कंसा के लादा, सखी रे!